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A Humble Appeal for a Better Tomorrow

Our society is male-dominated, and there is a need for change. Men often consider themselves superior, and women, when they become daughters-in-law, experience the consequences of this mindset. Ironically, when some women become mothers-in-law, they too begin to reinforce patriarchal attitudes. We need to instill good values in our children to build a better society. After the birth of girls, they should not be taught that household work is solely a woman's responsibility. Instead, children should be taught that everyone should be self-reliant and capable of managing their own tasks. Fathers, in particular, should take an active role in teaching girls and boys skills such as cooking, so that children do not grow up believing that only women are responsible for domestic work. Otherwise, the day may not be far when fewer people are willing to marry, and relationships will continue to break down. For girls, the term maayka (parental home) is commonly used, while a boy's home is s...

समाज का पुनर्निर्माण

 हमारा समाज पुरुष प्रधान है इसमें बदलाव की जरूरत है। पुरुष स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है और महिला जब बहु होती वह भी इससे गुजरती है सास बनते ही पुरुष प्रधान को बढ़ावा देती है अब हम महिलाओं को अच्छे संस्कार बच्चे को देने चाहिए एक अच्छे समाज के निर्माण के लिए। लड़कियों को जन्म के बाद यह शिक्षा नहीं देनी चाहिए कि घर का काम लड़कियों का ही होता यह सिखाना चाहिए हर किसी को आत्मनिर्भर और स्वयं से काम करना आना चाहिए। हमेशा पिता ही अधिकांशतः लड़कियों को खाना बनाना सिखाये जिससे बचपन से ही बच्चों की एक दिशा में सोच आगे ना बढ़े कि लड़कियां ही काम करती है नहीं तो वह दिन दूर नहीं कोई शादी करने को तैयार नहीं होगा और रिश्ते टूटेंगे। लड़कियों के लिए मायका और लड़कों का घर बोला जाता है लड़कियो के मायके को भी घर बोलना चाहिए, शब्दावली में सुधार हो। लड़कियों की किस्मत देखिए मां पापा तक बहुत मन करता अपने मायके/घर जाने का उसमें भी ससुराल का बन्धन होता है। वैसे अब बहुएं भी अपनी खुशी की ओर ध्यान दें रहीं हैं जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। प्राचीन काल में बहुत समय बाद जाती थी अब समय के साथ सुधार आया है ...

Life

 स्वार्थ से भरे हर रिश्ते को तोड़ देना चाहिए जिस दिन तुम्हें यह लगता है, स्वयं से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता है।             इला 

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 लड़कियों को जन्म से बता दिया जाता है जन्म ले लिया है अब घर का काम तुम्हारा है हम स्वयं अपनी लड़कियों का भविष्य बर्बाद करने के उत्तरदाई है। हमें समझना होगा हम अपने कामों के लिए ही उत्तरदाई है। गलत शिक्षा समाज को पीछे ले जा रहीं हैं देश पुरुष प्रधान बनते जा रहा है बनाने वाली हम अशिक्षित स्त्री ही है जो शिक्षित होते हुए भी धीरे धीरे समाज को खोखला करते जा रही है। प्रेम , दया अपने स्थान में सही है तनाव के साथ नहीं।। अपनी शक्ति को पहचानो आने वाली पीढ़ी को आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाओ।  इला 

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Truth of life

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प्रेम का सही रूप

प्रेम में बहुत गहराई छिपी होती है यह समय के साथ समझ आता है लड़कपन में हम प्रेम को नहीं समझ पाते हैं, मनुष्य को स्वयं से सर्वप्रथम प्रेम करना चाहिए। सिर्फ किसी के बोलने से उसे प्रेम नहीं समझना चाहिए, प्रेम कर्म और एक झलक में प्रकट हो जाता है। जो तुम्हें प्यार नहीं करता उसे कभी प्यार नहीं करना चाहिए नहीं तो अपने मन को दुखी करोगे। प्रेम, प्रेम से उत्पन्न होता है कभी ध्यान दिया जब ईश्वर से प्रेम हो जाये तो दिल भर आता है क्योंकि वो तुम्हे तुमसे ज्यादा प्यार करते हैं। हर रिश्ते में प्यार हो तो ईश्वर का अनुभव होता है नहीं तो एक समझौता और अवसाद का रास्ता है। पश्चिम की संस्कृति समझौते में रहना पसंद नहीं करती है भारतीय संस्कृति समझौते को जीवन बना लेती है लेकिन खुश‌ कभी नहीं रहती है। जीवन एक बार मिलता है मेरा मानना है प्यार नहीं है रिश्ते में उसे मौका दो , जब लगे यह एक बेवकूफी भरा और‌ सहा नहीं जा सकता। सब छोड़ दें। स्वयं को जाने, स्वयं को महत्व दें। मृत्यु निश्चित है अपनी खुशी तलाशे।। प्रेम को प्रेम हमेशा पहचान लेता हैं छोड़ता नहीं, रिश्ते वहीं टूटते हैं जहां प्रेम नहीं है , स्वयं को सही मानते, ह...

life

मेरे अनुभव आत्मा का आना और जाना सत्य है।। गीता का ज्ञान सत्य है। ऊर्जा का संरक्षण का नियम भी सत्य है।। यह परिलक्षित करता है पुनर्जन्म भी निश्चित ही होगा। ऊर्जा ही द्रव्यमान देती हैं। यह कहा जा सकता है इस संसार में हमारा आना और जाना लगा रहता है लेकिन आकार अलग है आत्मा एक ही है। हम जन्म के बन्धन से तभी छूट सकते हैं जब हम एक प्रकाश पुंज/ईश्वर में मिल जाये ।जिसका रास्ता हमारे मन से होकर जाता है। वह अनुभव आनन्दमय होगा।        इला 

जन्म और मृत्यु

स्थूल शरीर नश्वर है लेकिन सूक्ष्म शरीर ना कभी मरा है उसकी मृत्यु असम्भव है, वह हमारे अनेक जन्मों का ज्ञान लिए हुए है वह ही हमारा सच और अस्तित्व है लेकिन हम ना उसे जान सकते, हमें सब पता है जन्म और मृत्यु के पहले और बाद में क्या होता है । कारण शरीर दोनों का निर्माण करता है। सूक्ष्म शरीर को अनुभव ध्यान विधि से किया जा सकता है और आध्यात्मिक तरीके से। देखा जाए तो हम तो कभी मरे ही नहीं , स्थूल शरीर बदल रहे हैं। भौतिक विज्ञान का सिद्धांत भी कहता ऊर्जा ना उत्पन्न की जा सकती ना नष्ट करती जा सकती है, आध्यात्म ही एक मात्र साधन है जो ऊर्जा को नियंत्रित कर सकता है, प्रयोग से सम्भव नहीं है।। आत्मा को ज्ञान से समझ सकते हैं बुद्धि से नहीं। ज्ञान वह है जो हमारे अन्दर छिपा है, बुद्धि तो तर्क करती है।। हमारा स्वयं को जानना बहुत मुश्किल सा लगता है। जब इस संसार में आकर स्वयं को जानने की कोशिश नहीं करनी तो शायद हम उत्पत्ति के कारणों से भटक गये है, मुझे लगता है मृत्यु के समय इस बात का दुःख जरूर होता होगा, कैसे संसार में उलझते चले गए जब सत्य सामने होगा स्थूल और सूक्ष्म शरीर दोनों रूबरू होंगे कुछ पल के लिए तब ...

Truth of life

जीवन का प्रारंभ और अन्त एक पहेली है, नहीं, हम सब जानते हैं लेकिन भूल गये है। मानव सब याद रखें, तो वह कभी खुश नहीं रह सकता है । क्या तुम्हें याद है गर्भ में एक एक दिन कैसे कटा होगा? जिस दिन हममें आत्मा आई उस दिन कितना दर्द हुआ होगा वह काम, क्रोध, लोभ, मोह के जाल से घिरती गयी। जिस दिन मृत्यु होगी उस दिन भी बहुत दर्द होता, लेकिन मुझे लगता है उस दिन हमारी आत्मा बहुत खुश होती है वह इस संसार से मुक्ति चाहती है, वह तो बंधी हुई है लेकिन मानव मृत्यु से डरता है। मुझे तो यह अनुभव होता कि हम कल्पना है या वास्तव। हम काम, क्रोध, लोभ मोह ने यह संसार को बनाये रखा है, आत्मा को जकड़े रखा है। इस काल्पनिक या वास्तविक जीवन का आधार ही यह रखा गया होगा। मेरे यह समझ नहीं आता जो मैं हूं वो वास्तविक है या जो नहीं हूं। मनुष्य जब शान्त हो स्वयं से पूछें क्या वह सही / कर्म/ मन/ धैर्य/ सरल/ प्रेममय है वह स्वयं समझ जाता है लेकिन कोई स्वयं से क्यों प्रश्न करें। वह बाहरी दुनिया में खोया है। मन के अन्दर झांक कर लगता है सब शून्य है, नया जीवन, संसार, मन में है लेकिन आंख खोलते ही जिम्मेदारी और काम/ क्रोध/ लोभ/ मोह हमें अव...

मेरे अनुभव

मुझे लगा कि जीवन की उत्पत्ति और अंत एक चुम्बक की तरह हैं, जो एक साथ जन्म लेते हैं और खत्म भी हो जाते हैं। मानव जीवन सभी योनियों में सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि हर योनि में कुछ न कुछ कमी रह जाती है, जो धीरे-धीरे दूसरी योनि में पूर्ण होती है। जब मानव जीवन मिलता है, तब हम सोच-समझ सकते हैं। मनुष्य का मन जरूर पूछता है—क्यों और कैसे? कोई इस पर ध्यान देता है, कोई नहीं। वैसे, यह जीवन हमें साकार रूप से निराकार को समझने के लिए ही मिला है। दुख और सुख हमें जीवन व्यतीत करने के लिए दिए गए हैं। अगर दुख में नींद आ रही है, तो समझिए कि दुख सामान्य है; यह समय के साथ दूर हो जाएगा। मेहनत करें, हो सकता है अच्छा परिणाम न मिले, लेकिन जो मेहनत के बाद परिणाम का इंतजार करता है, वह मन किसी सफल व्यक्ति से भी ज्यादा आनंद लेता है। जैसे ध्यान में जो खुशी मिलती है, उसे वही समझ पाता है जो अनुभव करता है। ध्यान में वह हर रिश्ता तोड़ देता है, सब छोड़ देता है, चिंता से मुक्त हो जाता है और चाहता है कि मैं खुद को जान पाऊं—यही उसे खुशी देता है। हर मनुष्य अपनी जगह महान है, क्योंकि वह विविधता बनाए रखता है। मैं भी दुखी बहुत रहती ह...

Life

जीवन को जीना स्वयं पर निर्भर करता है; समय तो बीत ही जाएगा। जब यह अनुभव हो कि जीवन में मन प्रसन्न नहीं है, तो तुरंत स्वयं का अध्ययन करें और उस इच्छा, व्यक्ति, लालसा, कामना या स्थान से दूर हो जाएँ। सबसे पहले स्वयं का साथ दें; स्वयं को मजबूत बनाना ही हमें जीवन को धैर्य के साथ समझने का मार्ग प्रदान करता है। —इला

Life

एक अन्धकार से दीप्तिमान संसार फिर एक अन्धकार, नश्वर जीवन में एक अभिलाषा, पूर्वनिश्चित एक चक्र, क्या जीवन का अन्त एक नया प्रकाश भरता होगा। हमारी आत्मा हर एक तथ्य और तर्क समाहित किये है। क्या इस नियत जीवन को चलाने के लिए आत्मा और मस्तिष्क को जोड़ने का कोई माध्यम नहीं सिवाय ध्यान मार्ग के, क्या ध्यान एक ऊर्जा को उचित दिशा में निर्देशित करने का माध्यम है। क्या अभी कोई भी उचित मार्ग तक नहीं पहुंच पाए जो प्राचीन समय में ऋषि मुनियों ने खोज निकाला था। क्या हम स्वयं को जानने की ललक रखते हैं। जीवन का सत्य रोचक होगा या हमसे जुड़ी एक छोटी सी पहेली?--इला जोशी

Lord Shiva

शिव भी तुम शक्ति भी तुम, मेरे अंतर्मन का अहसास भी तुम, असीम ऊर्जा हो तुम, विज्ञान के मूल में तुम, कला के श्रृंगार हो तुम, ध्यान की मुद्रा में दुनिया छुपा लेते, नयन खुले तो एक क्षण में सृष्टि बदल देते, मनुष्य को माया में फंसा देते जो माया से बच जाए उसे स्वयं में समा लेते। वर्णन से परे हो , अहसास ही मानो सबसे खूबसूरत हो, मित्र हो , प्रेम भी हो, जगती दुनिया में नहीं मिले तो मेरी रात में हो। उदासी भरी जिंदगी में सिर्फ सोचने से ही रंग भर दो वो हो तुम। कभी ऊर्जा में हो कभी द्रव्यमान में हो तुम। लेखनी उठाए तो मेरे भावों में हो तुम। आरज़ू तो बहुत है मेरी लेकिन जब दिल से पूछो मूलभूत इकाई हो तुम। क्यों रूक गयी मैं, अच्छा मेरी बढ़ती धड़कन में मुझे अपने अस्तित्व को बताने वाले हो आप, कभी कभी मेरी आपसे मिलने की चाहत को मेरी लेखनी बनाने वाले हो आप। प्रेम और श्रृद्धा (तुम/आप) के कर्णधार हो आप।।--इला जोशी

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love

प्रेम शब्दो से परे है, प्रेम को सिर्फ प्रेम पहचान सकता है। बिना प्रेम के प्रेम का अन्त स्वतः हो जाता है।।-इला

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जीवन भी कितना भिन्न है—दिखता कुछ है, होता कुछ और है। हम स्वयं से प्रश्न करें: क्या हम सही हैं? क्या हम निःस्वार्थ प्रेम करते हैं, या कहें, क्या हमें दूसरों की परवाह है? क्या हम स्वयं से पहले दूसरों के बारे में सोचते हैं? क्या हम अपनी खुशी से पहले दूसरों को प्राथमिकता देते हैं? क्या हम रिश्तों में प्यार भरने के लिए स्वयं भी कुछ करते हैं? हम स्वयं को ही नहीं जानते, बस उम्मीदें बढ़ती रहती हैं। जीवन की कठिनाइयाँ इसे जटिलताओं की ओर ले जा रही हैं। मनुष्य का स्वयं पर ध्यान न देना एक समस्या बनता जा रहा है, जो जीवन की मधुरता को समाप्त कर देगा। एक दिन ऐसा आएगा जब सब केवल दूसरों से अपेक्षाएँ करते रह जाएँगे और रिश्ते खत्म हो जाएँगे। आज के युग में रिश्ते दिल से खत्म हो रहे हैं; कुछ समय बाद सब इसे स्वीकार कर अलग-अलग जीवन जीने लगेंगे। इसका जिम्मेदार हम स्वयं हैं, जो बुरी तरह स्वार्थी बनते जा रहे हैं। प्रेम का अभाव है—मोह तो बहुत है, पर प्रेम की परिभाषा हम भूल गए हैं। — इला