life

जीवन भी कितना भिन्न है—दिखता कुछ है, होता कुछ और है। हम स्वयं से प्रश्न करें: क्या हम सही हैं? क्या हम निःस्वार्थ प्रेम करते हैं, या कहें, क्या हमें दूसरों की परवाह है? क्या हम स्वयं से पहले दूसरों के बारे में सोचते हैं? क्या हम अपनी खुशी से पहले दूसरों को प्राथमिकता देते हैं? क्या हम रिश्तों में प्यार भरने के लिए स्वयं भी कुछ करते हैं? हम स्वयं को ही नहीं जानते, बस उम्मीदें बढ़ती रहती हैं। जीवन की कठिनाइयाँ इसे जटिलताओं की ओर ले जा रही हैं। मनुष्य का स्वयं पर ध्यान न देना एक समस्या बनता जा रहा है, जो जीवन की मधुरता को समाप्त कर देगा। एक दिन ऐसा आएगा जब सब केवल दूसरों से अपेक्षाएँ करते रह जाएँगे और रिश्ते खत्म हो जाएँगे। आज के युग में रिश्ते दिल से खत्म हो रहे हैं; कुछ समय बाद सब इसे स्वीकार कर अलग-अलग जीवन जीने लगेंगे। इसका जिम्मेदार हम स्वयं हैं, जो बुरी तरह स्वार्थी बनते जा रहे हैं। प्रेम का अभाव है—मोह तो बहुत है, पर प्रेम की परिभाषा हम भूल गए हैं। — इला

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