प्रेम का सही रूप

प्रेम में बहुत गहराई छिपी होती है यह समय के साथ समझ आता है लड़कपन में हम प्रेम को नहीं समझ पाते हैं, मनुष्य को स्वयं से सर्वप्रथम प्रेम करना चाहिए। सिर्फ किसी के बोलने से उसे प्रेम नहीं समझना चाहिए, प्रेम कर्म और एक झलक में प्रकट हो जाता है। जो तुम्हें प्यार नहीं करता उसे कभी प्यार नहीं करना चाहिए नहीं तो अपने मन को दुखी करोगे। प्रेम, प्रेम से उत्पन्न होता है कभी ध्यान दिया जब ईश्वर से प्रेम हो जाये तो दिल भर आता है क्योंकि वो तुम्हे तुमसे ज्यादा प्यार करते हैं। हर रिश्ते में प्यार हो तो ईश्वर का अनुभव होता है नहीं तो एक समझौता और अवसाद का रास्ता है। पश्चिम की संस्कृति समझौते में रहना पसंद नहीं करती है भारतीय संस्कृति समझौते को जीवन बना लेती है लेकिन खुश‌ कभी नहीं रहती है। जीवन एक बार मिलता है मेरा मानना है प्यार नहीं है रिश्ते में उसे मौका दो , जब लगे यह एक बेवकूफी भरा और‌ सहा नहीं जा सकता। सब छोड़ दें। स्वयं को जाने, स्वयं को महत्व दें। मृत्यु निश्चित है अपनी खुशी तलाशे।। प्रेम को प्रेम हमेशा पहचान लेता हैं छोड़ता नहीं, रिश्ते वहीं टूटते हैं जहां प्रेम नहीं है , स्वयं को सही मानते, होते ही सही है अपनी जगह बस एक कमी होती प्रेम की, वहीं जोड़ती वहीं छोडती है।। प्रेम का जन्म निस्वार्थ से होता है। जो अब बहुत ही कठिन‌ है। 

                                    इला

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Truth of life

मेरे अनुभव

जन्म और मृत्यु